मेरी हदें...
"सफ़लता-एक रहस्य" और ज़िंदगी
इसीलिए मैने शीर्षक "सफ़लता-एक रहस्य"और ज़िंदगी रखा क्योंकि मुझे लगता है कि सफ़लता की परिभाषा जीवन के हर मोड़ पर अलग - अलग होता है और ये ऐसी अंतहीन यात्रा है जो जीवनपर्यन्त चलती रहती है।
कुछ पंक्तियां ज़िंदगी के नाम:
ये तो रोज़ चलने वाली यात्रा है ,
क्यों इतना भाग रहे हो ?
थोडा आराम भी कर लो यार ,
बचपन से ही कुछ तलाश में हो ,
क्या पाना चाहते हो ?
क्या कभी सोचा तूने,
कितनों को खो दिया इस होड़ में ?
जब भी तुम कुछ पाते हो,
साथ में कुछ खोतें भी हो,
क्या कभी गौर किया तूने ?
तूने खुद को ही खो दिया कहीं,
आ जाओ फ़िर से मिला दूँ ,
तुझे तुम्ही से,
एक बार फ़िर ,
जीना सिखा दूँ तुझे ,
खींचनी होगी,
यही दस्तुर है हमारा,
थोडा खुश होकर ,
फ़िर अगली मंज़िल की तरफ़,
चलना होगा,
चलते रहना है लगातार ,
बीच-बीच में
मिलाते रहना है,
जीवन में हमेशा एक नई,
इबारत लिखते रहना है,
यही तो ज़िंदगी है,
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नाग पंचमी
जब हमलोग अपने गाँव में रहते थे उस समय नाग पंचमी से कुछ दिन पहले से ही स्कूल के प्रांगण में बने आखाँडे में कुश्ती का प्रैक्टिस शुरू हो जाती थी. गाँव के कुछ होनहार लड़के बडे मज़े से मिट्टी मे को अपने पूरे शरीर पर मलते थे. शाम को रोज़ एक बार मैदान में जाना हो ही जाता था.अक्सर पैरों में चोट लग जाती थी और कही ना कही छिल जाना आम था. चारों तरफ़ खेतों में धान की बुआई अपने चरम पर रहता था. बडे लोग हमे बताते थे नाग पंचमी के दिन से त्योंहारों की शुरुवात होती है .
नागपंचमी के दिन पुरा गाँव ही स्कूल के मैदान में एकत्रित होता था.पुरी विधि -विधान से कुश्ती का कार्यक्रम आयोजित होता था, उसके बाद कबड्डी. प्रसाद वितरण के बाद प्रोग्राम का समापन होता था.
आज बहुत दिन हो गये इस तरह के आयोजन का हिस्सा बने हुए , पर आज भी बचपन की वो सारी यादें किसी फ़िल्म तरह दिलों-दिमाग में चलती रहती है.
ये हमारी परंपरा है जो हमे भूलनी नही चाहिये. ये हमें बहुत कुछ सिखाती भी है . आप सभी को 'नाग पंचमी' की हार्दिक शुभकामनाए.
आपका,
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कलाम - शत शत नमन
एक ऐसा शख्स जिसकी सादगी ,अनुशासन ,काम के प्रति समर्पण और राष्ट्रवादी सोच ने देश में इतना लोकप्रिय हुआ कि तत्कालीन कोई भी नेता ,अभिनेता या खिलाडी उनके सामने कुछ नहीं था। हमारी जेनेरशन ने कभी गांधी ,मदन मोहन मालवीय ,पटेल , बोस आदि महापुरुषों को जीवित नहीं देखा है परन्तु एक बात मै दावे के साथ कह सकता हूँ वो ज़रूर कलाम जैसे विचार रखते होंगे।
एक ग़रीब मुस्लिम परिवार में जन्मा एक लड़का अख़बार बेच कर अपनी पढाई पूरा करके, इंजीनियर और वैज्ञानिक बनकर देश को मिसाइल और परमाणु सम्पन्न बनाता है और यही नहीं गीता और कुरान दोनों पढ़कर देश का राष्ट्रपति भी बन जाता है।धर्मनिर्पेक्षता का सही अध्ययन करना हो तो कलाम साहब की जीवनी एक बार अवश्य पढनी चाहिए. देश के इतिहास में सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रपती अब्दुल कलाम ही थे.
राजनीति
एक बार फ़िर नितिश कुमार ने अपने अंतरात्मा की आवाज़ पर लालू को छोड़कर अपने पुराने साथी सुशील मोदी के साथ हो लिये. क्या ये घटनाक्रम फिक्स था ? राजनीति में एक चीज़ ही फिक्स होती है वो है कुर्सी . जो भी व्यक्ति सत्ता पाने में सफ़ल हो जाता है और साथ ही साथ अपना चेहरा भी दागदार होने से बचा लेता है वही सबसे बडा राजनीतिज्ञ है . नितिश ये सब करने में माहिर है और उन्होंने ये कई बार साबित भी किया है .
सही क्या गलत क्या है ये सब आप चर्चा करते रहीये. मैंने इससे पहले अपने पूर्व के लेखों में पहले ही बताया है .
“Nothing is right or wrong it’s state of mind” only.
अच्छा मसाला है न्यूज चैनलों के लिये ,अगला 15-20 दिन तो निकल ही जायेगा जब तक कि कोई नया मुद्दा ना मिल जाए.
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बारिश कहती है..
बारिश कहती है ,
आ भीगा दूँ तुझे ,
तेरे तन के साथ...
मन को भी,
तर कर दूँ....
बारिश कहती है,
तू तो कहता था ,
बहुत गर्मी है आज ,
फ़िर क्यों छुपा भाग रहा ,
आ थोड़ा पानी की,
सैर करा दूँ ,तैरा दूँ तुझे ,
इस निर्मल जल में ,
बारिश कहती है,
आज तेरे मन को भर दूँ ,
तेरा रोम -रोम जलमग्न कर दूँ ,
आ जी ले जी भर कर ,
कहाँ भागा जा रहा,
बारिश कहती है,
सारे खेतों में ,नदी ,नालों ,
जल भर दूँ ,
ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान है तेरा ,
ऐ वन्दे ,
तेरे खाने-पिने का प्रबंध कर दूँ ,
बारिश कहती है ,
तूने जो कुकर्म किया ,
धरती माँ को इतना गर्म किया ,
पेड़ों को तूने काट दिया ,
टुकड़ो -टुकड़ो में बाँट दिया,
आ फ़िर से इसे एक कर दूँ ,
बारिश कहती है,
तू शायद भूल गया ,
अपनी औकात ,
लाँघ गया सीमा को अपने ,
घने जंगलो को शहर बनाया ,
गंगा मइया को नाला ,
ये तूने ठीक ना किया
बारिश कहती है,
आ प्रण ले इस साल ,
लगाएगा पेड़ हर साल ,
ना करेगा गंदा नदियों को ,
बनाएगा एक मिसाल ,
प्रकृति है..... तो तू है.
नहीं खेलेगा इससे ऐ इंसान ,
बारिश कहती है...
आपका ,
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चिन्टूआ के इंजिनियर बनने की कहानी
ये मंत्र चिन्टुआ को भा गया। इंटर पास होने के बाद ये तीसरा साल था ,बाबूजी से कहानी बताकर क़रीब 50000 हज़ार डोनेशन देकर चिन्टुआ एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला ले लिया। और इंजीनियरिंग की पढाई करने लगा। उधर मोहन MLNR से इंजीनियरिंग के अंतिम साल में था और उसका एक बड़े कंपनी में प्लेसमेंट भी हो गया था। धीरे -धीरे मोहन अपनी ज़िन्दगी के कठीन पक्ष से बाहर निकल गया और एक अच्छा जीवन व्यतीत करने लगा। उधर चिन्टुआ का हर सेमेस्टर में कोई ना पेपर बैक लग जाता था। करते -करते चार साल गुजर गए लेकिन चिन्टुआ का डिग्री अभी पूरा नहीं हुआ था। आख़िरकार पांचवें साल में उसने इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी कर ली। चिन्टुआ का ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। उसके बाबूजी पुरे गांव में मिठाई बटवां दिए क्योंकी उनका चिन्टुआ अब इंजीनियर चितरंजन प्रसाद बन गया था।
अब चिन्टुआ को चिन्टुआ कहने से बुरा लगता था। वह अपने घर के आगे नेम प्लेट लगवा दिया जिसमे लिखा था "इंजीनियर चितरंजन प्रसाद , बी टेक FROM इलाहाबाद। "
डिग्री के दो साल होने को था चिन्टुआ को कहीं से भी कोई जॉब ऑफर नहीं था। धीरे -धीरे उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था। अब वह इलाहाबाद छोड़ने का मूड बनाकर वापस अपने गांव आ गया। गांव आ कर वह अपने बाबूजी के काम में हाथ बटाने लगा। ये बदलाव देखकर उसके बाबूजी ने उससे पूछा "अब का खेतीए करेके बा आगे , एतना पैसा खर्चा करके तोहके पढ़ैली - लिखैली इहे काम करेके ख़ातिर ?" ये सुनकर चिन्टुआ के आँख में आंसू आ गया और वो बोला "बाबूजी हमरा से बहुत बड़ गलती हो गइल , दूसरा के देखा -देखी काम ना करेके चाहि , हम यदि तोहार बात मान गइल रहती तअ हमहुँ भैया के संगे आर्मी में भरती हो गइल रहती "
आज हमारे समाज में इस तरह के ढेर सारे चिन्टुआ है। ज़रूरी है की उन्हें सही समय पर जगाया जाये ,इससे पहले की लेट हो जाये। समाज में देखा -देखी कैरियर बनाने का एक चलन हो गया , ये जाने बिना की छात्र के जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। उसका झुकाव किस तरफ़ है , किस फिल्ड में उसे आगे बढ़ने का प्लान है। अपने बच्चों को क्या करना है उन्हें गाइड करिये और हमेशा उनके ग्रोथ का परिक्षण करते रहिये। कब आपका बच्चा इतना बड़ा हो जाये की वो चिन्टुआ की तरह अपनी ज़िन्दगी ज़ीने लगे इसकी भनक आपको नहीं लगेगी और फिर पछताने के सिवा कुछ नहीं बचेगा।
हमारे समाज में चिन्टुआ भी है और मोहन भी। पहचानने की ज़रूरत है और उसके हिसाब से
जीवन को मोल्ड करने की कोशिश करते रहना चाहिए।
उपर्युक्त कहानी मैंने मेरे कुछ अपने अनुभव और कल्पना के आधार पर लिखी है। कहानी के भाव को समझते हुए भाषा में कुछ भोजपुरी शब्दों का प्रयोग किया है जिससे आसानी से देसी तरीके से मै अपनी बात उन लोगों तक पंहुचा पाऊ। कोशिश है मेरी जितना हो सके जो मैंने महसूस किया है अपने अभी तक के जीवन में उसे लोगों को बता सकूँ। इस लेख से यदि एक भी चिन्टुआ, मोहन बनने की राह पकड़ लेता है तो मेरी लेखनी सफ़ल है। कृपया जनहित में इसे शेयर करें।
आपका ,
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ज़िद है ..
अख़बार (फ़ेरी ) वाले का विश्लेषण
नंगे पाँव
नंगे पाँव चलके देखा,
ऐसा लगा जैसे तलवों ने,
धरती को चूम लिया ,
एहसास ,कैसे बताऊ तुझे ,
ऐसा लगता है , जैसे
बंजर में बारिश का पानी भरा,
कितने दूर हो गये धरती माँ से,
जिसने हमे जीना सिखाया ,
उससे भी इतना दूर हो गये कहाँ से,
और बीमार ना पड़ना,
अब तो बंद चहारदिवारी में ही,
सारी दुनिया सिमट गयी है ,
खेतों के बिच टहलना,
मिट्टी में रमे रहना,
लेट होने पर बड़ो की,
डाँट सूनना और बहाने बनाना,
बताना और दिखाना पड़ता है ,
उन्हे डिजीटल भाषा ही
समझ आती है,
कैसे होगा एहसास उन्हे,
मिट्टी की महक क्या होती है ,
बारिश की बुंदे देखने का ,
शौक हो गया,
कैसे होगा एहसास उन्हें
उन बूँदो की ठंडक का,
एक बार नंगे पाँव,चलना तो होगा
रिश्ते फेसबूक,वाट्सअप,
विचैट और ट्विटर हो गया,
ना मिलना किसी से,ना मिलाना किसी को,
चलके तो देखो ,
पैर के तलवों को महसूस करने दो ,
भूल जाओगे सारे गमों को यकीनन,
कभी इसे आजमां के तो देखो ,
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सेल्फ़ी - एक नया जानलेवा क्रेज़ Selfie : A New Dangerous Craze
अभी तो चलने की शुरुवात है
अमरनाथ -हमला
हे भोले ...
कर दो कुछ
ऐसा इस सावन में,
मिट जाये लोगों के ,
कष्ट,ना रहे भूखा-प्यासा कोई ,
इस धरा पर ,
ना हो मौत किसी का ,
भूख से ,
जो उगाता है ,
वही भूखा है ,
और जो खाता है ,
वो तय करता उनकी नियति,
वाह क्या विडंबना है,
हे भोले
क्यों बनाया भिन्नता ,
इंसानों के बिच,
कोई खा-खा के मर रहा,
कोई बिना खाये ही,
सो जाता है,
किसी के पास,
पहनने को कुछ भी नहीं ,
और किसी को पसंद का ,
रंग नहीं मिलता ,
कर दो ऐसा कुछ
इस सावन में भोले ,
भूखे को खाना मिल जाये ,
नंगे को ओढ़ने को मिल जाये ,
हे भोले
बहुत अशांति है अभी ,
दुनिया में,
क्यों प्यासे है खून के ,
एक दूजे के,
क्यों मार -काट मची है ,
इस दुनिया में ,
रक्तरंजित हो रही धरा,
क्षीण हो रही मानवता है,
कर दो ऐसा कुछ
हे भोले की
शांत हो जाये धरा ,
हे भोले ,
क्या पाना चाहता इंसान ,
सब जानते हुए ,
अनजान क्यों है ,
जब समृद्धि ना हो तो अशांत ,
समृद्धि आ जाये तो असंतोष ,
आखिर मंज़िल तो एक ही है,
फिर क्यों पड़ा है ,
चक्कर में ,
मिटा दो द्वेष भाव मन से ,
इस सावन में,
हे भोले।
हे भोले ,
करके तांडव ,
आ जाओ इस सावन में ,
मिटा दो दुखों के घना को ,
कर दो खुशहाल,
इस धरा को,
हे भोले।
हर -हर महादेव
आपका ,
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मेरे गुरु जी -त्याग,संघर्ष और सफ़लता की कहानी
आज़ादी के बाद जब हमारा देश बदल रहा था उस समय उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर ज़िले के एक छोटे से गाँव गंगौली में एक ग़रीब मुस्लिम परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। बच्चे की ख़ुशी में पूरा परिवार बेहद खुश था। धीरे -धीरे जब बच्चा बड़ा होने लगा परिवार की ख़ुशी अचानक ग़म में बदलने लगी। उनके ग़म का कारण था बच्चे का पोलियो से ग्रसित होना , बच्चा अपने दोनों पैर से विकलांग हो गया था। वो अपने दोनों पैरों से चल पाने में अक्षम था। परिवार में मानों दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सभी लोग बच्चे के भविष्य को लेकर काफ़ी चिंतित थे। गांव , मुहल्ला, रिश्तेदार सब मिलने आते थे और बच्चे को तरस भरी निगाहों से देखते हुए कहते थे "अब इनका क्या होगा " , छोटा बच्चा ये सुनते और देखते हुए बड़ा हो रहा था। और बच्चे के में मन में एक बात घर करती जा रही थी कि वो कुछ कर नहीं पायेगा। भगवान ने उसे एक बहुत बड़ी चीज़ दी थी और वो था तेज़ दिमाग़। समय बीतता जा रहा था जब बच्चा मिडिल स्कूल में था उसी गांव के प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य ने उस बच्चे की प्रतिभा को देखते हुए उसके बारे में परिवार से कहा, ये और कुछ तो नहीं लेकिन टीचर बन सकता है। बच्चा ये सब सुन रहा था और उसने उस कच्ची उमर में सुनी हुई बात को अपने दिलों -दिमाग़ में बैठा लिया और ये मान लिया वो कम से कम टीचर तो बन सकता है। और यही से शुरू हुई एक बच्चे के टीचर बनने की कहानी।
जिस ज़माने में ट्रांसपोर्ट का समुचित व्यवस्था नहीं था उस समय एक विकलांग बच्चे का अपने गांव से दूर निकल पाना आसान नहीं था। उस बच्चे ने अपने आत्मबल और इच्छाशक्ति से कभी अपने कमज़ोरी को हावी नहीं होने दिया। कक्षा में अव्वल आना अब उसकी आदत बन गई थी और उससे मिलने वाली छात्रवृति से अपने पढाई को आगे बढ़ाते रहा। समय बीतता गया और उस बच्चे ने हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास किया। इंटर में अच्छे अंक लाने से सारे लोगों ने उसे किसी बड़े यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग करने की सलाह दी , परन्तु बच्चे के मन में तो कुछ और ही चल रहा था। अपने प्रधानाचार्य की कही हुई बात "ये और कुछ तो नहीं पर टीचर ज़रूर बन सकता है", उसके दिलों-दिमाग़ में गूँज रही थी। यही सोचकर वो बच्चा जो अब किशोर हो गया था , BHU यूनिवर्सिटी में बीएससी में दाख़िला ले लिया। दोनों पैरों से विकलांग एक किशोर लड़के को अपने गांव से 100 किलोमीटर दूर बनारस आने -जाने में कितनी जद्दोजहत करनी पड़ती होगी ये सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते है। बहरहाल उस किशोर लड़के ने अपनी अपनी स्नातक की पढाई प्रथम श्रेणी में पास की। और अपने जूनून को पाने की ज़िद ने उस किशोर को उत्तर प्रदेश में सरकारी विद्यालय में टीचर के रूप स्थापित कर किया।
अध्यापक बनने के बाद उनका सिर्फ एक लक्ष्य था, उनके सानिध्य में आने वाले बच्चे क़ाबिल बने। और इस प्रोफेशन को प्रोफेशन ना मानकर समाज में शिक्षा को लेकर अलख जलाने का जो कार्य इन्होंने किया वो काबिलेतारीफ़ है। इन्होने ने कक्षा में क्लास लेने की पारम्परिक विधाओं में बदलाव किये और वो शैली विकसित किया जिससे बच्चों को पढाई में मज़ा आने लगे। वो कहते थे पढाई को मज़े लेके पढ़ो तो सब समझ आएगा। और उन्होंने अपने कार्यकाल में इसे साबित भी किया। और उनका नाम है श्री समीउल्लाह सर।
आज समीउल्लाह सर रिटायर हो गए है परन्तु आज भी वो अपने उसूलों के पक्के है। आज जिस तरह से शिक्षा का बाज़ारीकरण हो रहा है इससे उनकी आत्मा को काफ़ी ठेस पहुँचती है। वो कहते कि आज रटने की प्रवृति विकसित की जा रही है , समझने की नहीं, जो की घातक है। और चलकर ये बेरोज़गारी को बढ़ावा देती है। उनके द्वारा कहे बातों की एक लम्बी फेहरिस्त है। जो मै आपको अपने किसी और ब्लॉग में शेयर करूंगा। आज गुरुपूर्णिमा के दिन गुरु जी को शत -शत नमन।
आपका ,
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मिडिया से नियंत्रित होता हुआ राजनीति
और यही से भारतवर्ष की राजनीति की एक नई दिशा की शुरूवात हो गयी। आज हर पार्टी में एक सोशल मिडिया विंग है जो उस पार्टी के एजेंडा को लोगों के सामने रखती है। जो पार्टी जितनी आक्रमकता से मिडिया को मैनेज करती है वो उतनी ही तेज़ी से अपना वोट बैंक बढने का उम्मीद करती है। पर अब इसका दुष्प्रभाव दिखने लगा है। अब पार्टियाँ लोगों को मिडिया के द्वारा भ्रमित करने का प्रयास करने लगी हैं। जिसका दुष्प्रभाव ये है की लोगों का धीरे -धीरे सोशल मिडिया और डीजिटल मिडिया से भरोशा खत्म होने लगा है। हर छोटी-छोटी घटना को मिडिया में इस तरह से पेश करना की ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ है और उस पर राजनीति करना कहाँ तक जायज़ है। और आज ये हर पार्टी अपने -अपने क्षमता के अनुसार कर रही है।
मिडिया को मैनेज करने की जो कुप्रथा अभी सामने आयी है इसका विकराल स्वरुप अभी आना बाकी है। अभी हाल ही में देश के एक नामी न्यूज चैनल के मालिक का विडिओ सोशल मिडिया पर खूब वायरल हुआ जिसमे वो टीवी न्यूज चैनलों के स्याह पक्ष को सामने रखते हुए दिखते है। सुनकर एक आम आदमी के मन में मिडिया के प्रति जो छवी बनी है वो कही से भी देश हित में नही है। पत्रकारिता को लोकतंत्र में चौथा स्तंभ माना गया है। इससे भरोषा उठना मतलब लोकतंत्र की हत्या है जो किसी भी हालत में ठीक नहीं है ।
आज टी आर पी का ज़माना है ,हर दिन कोई ना कोई नंबर १ होगा ही। ज़्यादा रेटिंग के लिए न्यूज़ को बताने ज़्यादा न्यूज़ बनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है जो पूरा एंटरटेनमेंट पैकेज होना चाहिए। आज राजनीति का पैठ मिडिया में इतना ज़्यादा हो गया है कि सरकार बनते ही पहले ३० दिन ,१०० दिन और फिर एक साल का रिपोर्ट अनिवार्य हो गया है। रिपोर्ट अच्छा या बुरा ,चैनलों को मिलने वाली मुद्रा पर आधारित होता है। पूरा का पूरा फोकस राजनितिक पार्टियों की छवि बनाने में हो रहा है । इससे साबित हो रहा की आज भारत की राजनीती पूरी तरह से मिडिया से नियंत्रित है।
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Bold Decision (बड़ा फ़ैसला )
वो आंखें..
वो आंखें... वो आंखों में, चित्कार है कसक है, घर छुटने का ग़म है पराया होने का मरम है डर भी है, खौफ भी है वापस ना आने का दर्द है अपनों से ...
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क्षितिज, जल, पावक, गगन, समीर ये पंचतत्व से शरीर है इसी पंचतत्व की पूजा है (पानी मे रहकर आकाश की तरफ गर्दन किये हुए हाथ मे दीपक लेकर खुले ह...
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