वो पहली किरण के आने से पहले की,
ठंडी-ठंडी हवा की सरसराहट नहीं दिखती,
वो जेठ की दुपहरी की गर्माहट नहीं दिखती,
वो पेड़ के नीचे खटिया पर लेटे हूए,
कड़क गर्मी की वो शीतलता नहीं दिखती,
वहीं पेड़ के नीचे वो बड़े बुजुर्गों की ज्ञान की बातें
अब कहाँ चली गई?
ना सुनने वाला कोई ना सुनाने वाला बचा है,
ये कोन सा दौर है जो सब कुछ एक शीशे की सतह
सब कुछ उतारने की जद में है,
कैसे एहसास कराओगे इन नये नस्लों को,
बर्बाद होने से बचाओगे कैसे,
ज़रा रुककर सोचो तो सही,
क्या सच में अब पहले जैसा सुबह और शाम नहीं होती?
या सब कुछ वैसे ही है बस हमने देखना छोड़ दिया?
आपका,
©मेरा नज़रीया