खुद का दीदार..

खुद का दीदार

खुद का दीदार ना हुआ कई दिनों से,
खोया-खोया सा लगता है,
अब तो शीशे में चेहरा नहीं दिखाई देता,
कहाँ खो गया हूँ, समझ नहीं आता है।

अब पहले जैसी ना शाम होती है,
ना सुबह पहले जैसा लगता है,
ना जाने क्यों सब रूखा-रूखा सा लगता है,
सब बुझा-बुझा सा दिखता है।

कभी हँसता था बेवजह मैं,
अब मुस्कुराना भी मुश्किल लगता है,
कभी अपने ही ख्वाबों में जीता था,
अब हर ख्वाब अधूरा लगता है।

लोगों के बीच रहता हूँ फिर भी,
क्यों इतना अकेला लगता है,
सबको अपना हाल सुनाता हूँ,
पर खुद से ही कुछ छुपा-छुपा लगता है।

कभी सोचा था बहुत कुछ बनूँगा,
अब कुछ भी कहाँ अपना लगता है,
मंज़िल तो वही है सामने,
बस रास्ता कहीं खोया लगता है।

शायद थोड़ा थक गया हूँ मैं,
या वक़्त कुछ कहता लगता है,
शायद खुद को ढूँढने निकला हूँ,
इसीलिए खुद से दूर सा लगता है।

एक दिन फिर आईने के सामने,
खुद से मेरा सामना होगा,
चेहरे पर वही मुस्कान होगी,
और दिल फिर से अपना होगा।

बस थोड़ा सब्र रखना ऐ दिल,
ये वक़्त भी गुजर जाएगा,
जो खुद से आज बिछड़ गया है,
वो खुद से फिर मिल जाएगा।

— आपका, मेरा नज़रिया


खुद का दीदार..

खुद का दीदार खुद का दीदार ना हुआ कई दिनों से, खोया-खोया सा लगता है, अब तो शीशे में चेहरा नहीं दिखाई देता, कहाँ खो गया हूँ, समझ नहीं आता ...