प्रवासी मजदूर

कौन हैं ये? अपने ही देश में प्रवासी हो गये। गांव का खुलापन छोड़ कर , शहरों में कैद होने वाले आखिर ये कौन लोग हैं? क्यों इस महामारी के दौर में इन्हें अपने गांव में जाने की ज़िद है। दम घुटने वाले इस लाकडाउन में अपनी जान जोखिम में डालकर ये बस घर पहुंचना चाहते हैं। इन्हें पता है अपने चाहे कुछ भी हो भुखे नहीं मरेंगे। शहरों के इस काल कोठरी में दम घुटने का डर हमेशा इनके जेहन में बना हुआ है। शायद यही वजह है अपने घर पहुंचने की।

आपका,
मेरा नज़रिया

सब़र..

सब़र..  रख सब़र, हर मुश्किल छोड़ेगी अपना असर , बस मेहनत को बना अपना हुनर । ग़म ना कर, जारी रख अपना सफ़र , आज नहीं तो कल मिलेगी मंज़िल क...